Monday, 5 January 2015

//// भागवत - बनाम - ओवैसी .... दोनों को ख़ारिज करना ही होगा ////

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कल RSS प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिए गए वक्तव्यों पर नज़र डालें >>>>
> भारत हिन्दू राष्ट्र है - अगर हिन्दू समाज खतरे में आएगा तो देश भी खतरे में पड़ जाएगा ....
> इसलिए देश के लिए हिन्दू समाज को अपनी जवाबदेही तय करनी होगी - हिन्दुओं को एकजुट होना होगा ....
> ये देश परंपरा से हिन्दू देश है - देश के भले बुरे का जिम्मेदार हिन्दू है ....
> समाज को सरकार भरोसे नहीं रहना चाहिए - सरकार सब कुछ नहीं कर सकती ....
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और कल ही MIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी द्वारा दिए गए वक्तव्यों पर नज़र डालें >>>>
> इस्लाम सभी धर्मों का वास्तविक घर है ....
> जब सभी धर्मों के लोग इसे अपनाएंगे, तब यह वास्तविक 'घर वापसी' होगी ....
> हर बच्चा मुस्लिम पैदा होता है - माता पिता उसे अन्य धर्म में बदल देते हैं ....
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मित्रों अब आप और हम थोड़ी विवेचना भी कर लें ....
> हिन्दू कहेंगे भागवत सही और ओवैसी बकवास - ओवैसी साम्प्रदायिकता भड़का रहे हैं - वे मुसलमानो को उकसा रहे हैं - वे हिन्दू विरोधी बयान दे रहे हैं .... आदि इत्यादि ....
> मुसलमान कहेंगे ओवैसी सही और भागवत बकवास - भागवत साम्प्रदायिकता भड़का रहे हैं - वे हिन्दुओं को उकसा रहे हैं - वे मुसलमान विरोधी बयान दे रहे हैं .... आदि इत्यादि ....
> और यदि कोई दोनों के विरुद्ध बोलेगा तो उक्त धार्मिक उन्मादी सांप्रदायिक हिन्दू और मुसलमान उसे चुन-चुन कर गालियां देंगे और उसको 'सेक्युलर' कहके उसका उपहास भी करेंगे ....

मित्रों मैं आज फिर इन सभी धार्मिक उन्मादी सांप्रदायिक लोगों की गाली खाने के लिए मजबूर हूँ और हाज़िर हूँ - क्योंकि आज मैं फिर कलम और बुलंद आवाज़ से भागवत और ओवैसी दोनों को धिक्कारते हुए कहता हूँ >>>>
> केवल इंसानियत सभी धर्मों का मूल है ....
> जो पैदा होता है वो केवल इंसान ही होता है - न हिन्दू न मुसलमान ....
> जो हिन्दू और मुसलमान इंसानियत की बात करेगा सही मायने में घर वापसी उसकी ही होगी ....
> मैं चाहता हूँ हमारा देश न हिन्दुओं का हो ना मुसलमानों का - हो तो बस इंसानों का ....
> मैं चाहता हूँ कि समाज में साम्प्रदायिकता की कोई जगह नहीं हो - इसलिय हमें भागवत और ओवैसी दोनों को ख़ारिज करना ही होगा ....
> मैं मानता हूँ कि देश में सौहार्द स्थापित करने के लिए सरकार की अहम भूमिका होती है और जो सरकार इस दायित्व का निर्वहन नहीं करती उस सरकार को भी ख़ारिज करना ही होगा ....
धन्यवाद !!!!

Sunday, 4 January 2015

//// धार्मिक भक्तों का बीमा !! .... तो क्या राजनैतिक भक्तों का बीमा भी होगा ?? ////

आज दैनिक भास्कर के प्रथम पृष्ठ पर छपे एक विशिष्ठ समाचार की ओर आप सबका और विशेष कर "भक्तों" का ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा ....
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// सोमनाथ में भक्तों का पांच करोड़ का बीमा //
जूनागढ़ ! सोमनाथ ज्योतिर्लिंग महादेव मंदिर ने भक्तजनों की सुरक्षा के लिए पांच करोड़ रूपए का बीमा लिया है | इसमें प्राकृतिक आपदा और आतंकी हमले की रिस्क शामिल है | न्यास इसके लिए ७५ हजार रूपए प्रति वर्ष का प्रीमियम भुगतान करेगा |
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मित्रों अब मैं अचंभित हूँ कि यदि मंदिर के न्यास वालों या सही कहूँ कि ठेकेदारों या एजेंटों को ही महादेव से ज्यादा बीमा कंपनी पर या सांसारिक व्यवस्थाओं पर भरोसा हो गया है तो भक्त लोग ही क्यों लकीर पीट रहे हैं ??
क्या भक्तों को भी ये नहीं सोचना चाहिए कि महादेव जी से धन दौलत सुख समृद्धि मांगने से शायद नहीं मिलेगी - और उसके लिए तो सांसारिक व्यवस्थाओं के तहत सार्थक कर्म और प्रयत्न ही करने होंगे ??
अब ये तो हुई धार्मिक भक्तों की बात ....
पर क्योंकि आजकल धर्म और राजनीति का घालमेल चरम पर है तो मैं सोचता हूँ कि लगे हाथ राजनैतिक भक्तो के बारे में भी अपने उदगार प्रेषित कर ही दूँ ....
आजकल ये भक्त जो हर बात के लिए मोदी का अंधे बन समर्थन कर रहे हैं उन्हें भी चेताना चाहूंगा कि इतना भरोसा तारीफ जाप और भक्ति भी ठीक नहीं - भरोसा करें पर जरा नाप-तोल कर - महादेव या ईश्वर द्वारा दी गयी बुद्धि का सदुपयोग करते हुए - अपनी आँखे खोल कर .... नहीं तो कहीं ऐसा दिन ना देखना पड़े कि आपको भी बीमा करवाना पड़े ....
जैसे कि मसलन यदि मोदी कालाधन लाने या शौचालय बनवाने में अक्षम रहे तो बीमा कंपनी इसकी भरपाई करेगी !@#$%&?

Saturday, 3 January 2015

//// अरे भाई अब लफ़्फ़ाज़ी छोड़ कुछ काम भी तो करो - ताकि ना हो 'आलोचना' और ना ही लगें 'आरोप' ////

मोदी जी ने आज फिर बेसिर-पैर की बात कह मारी कि लोकतंत्र में 'आलोचना' तो होनी ही चाहिए पर 'आरोप' नहीं !@#$%&?
क्यों भाई क्या भारत में लोकतंत्र मई २०१४ से ही आया है ?
क्या मोदी जी ने मई २०१४ के पहले कभी किसी पर 'आरोप' नहीं लगाया था ?
और क्या मई २०१४ के बाद भी क्या मोदी जी ने किसी पर 'आरोप' नहीं लगाया है ?
क्या उनका उपरोक्त वक्तव्य भी मीडिया या स्वयं उनके आलोचकों पर 'आरोप' तो नहीं ? और 'आरोप' नहीं तो फिर 'आलोचना' का क्या औचित्य ??
मुझे तो ऐसे प्रश्न ही समक्ष में रखना हास्यास्पद लग रहा है .... मुझे लग रहा है कि ये ५६ इंची सीने वाले व्यक्ति को हो क्या गया है ? ये तो अब 'आलोचना' से भी भाग रहे हैं ? इतने कितने छुइ-मुई हुए जा रहे हैं ? जवाब देते नहीं बन रहा तो 'आलोचना' और 'आरोप' शब्दों का घालमेल कर बचना चाहते हैं ????
इसलिए अब ऐसे प्रश्नो को छोड़ मैं कुछ उच्च स्तर के प्रश्न रखता हूँ ....
यदि मैं वक्तव्य आप के समक्ष रखूँ कि - // मोदी सरकार निकम्मी है क्योंकि इस सरकार ने अपने वायदे अनुसार काम नहीं किये // .... तो अब आप बताएं कि मेरा वक्तव्य 'आलोचना' है या 'आरोप' ????
चलिए मैं ही साफ़ कर दूँ कि मेरा उपरोक्त वक्तव्य मेरी 'आलोचना' और 'आरोप' दोनों ही व्यक्त करता है - और मेरा उपरोक्त वक्तव्य देने का मुझे लोकतांत्रिक अधिकार है - और मेरे उपरोक्त वक्तव्य से लोकतंत्र को कदापि हानि नहीं पहुँच सकती है !!!!
अतः एक बार पुनः मोदी जी को समझाइश देना चाहूंगा कि लफ़्फ़ाज़ी युक्त बेमतलब की बचकानी बातें छोड़े - अपने दिमाग को सही दिशा में इस्तेमाल करें - क्या 'आलोचना' है क्या 'आरोप' हैं इस पर परेशान न हों - और बेहतर होगा कि कुछ काम करें - ऐसे काम कि ना कोई आपकी 'आलोचना' कर सके न कोई आप पर 'आरोप' लगा सके ..... धन्यवाद !!!!
और भक्तों से विशेष निवेदन - आपको मोदी जी की कसम - आगे से मेरे पर या अन्य किसी पर भी कोई 'आरोप' लगाने का लोकतांत्रिक पाप ना करें !!!!
हाँ आपकी 'आलोचना' मेरे सर-माथे - पर सावधान !! हर बार सौ बार निश्चित कर लेना कि कहीं 'आरोप' का पुट गलती से भी ना आने पाये .... वर्ना .... समझ गए ना ????

//// 'हिंदी' भाषा - क्या सुविधानुसार मापदंड ही औने-पौने बदल तो नहीं गए ? ////

आज मोदी जी ने १०२ वें भारतीय विज्ञान कांग्रेस का उदघाटन करने के उपलक्ष में अंग्रेजी में भाषण दिया !!!!
अभी तक हम मोदी जी के भाषण अधिकतर हिंदी में ही सुनते आये हैं जो विशिष्ठ शैली में धाराप्रवाह होते हैं और अपना असर भी छोड़ते रहे हैं !!!!
पर इसके विपरीत आज का भाषण नीरस और अजीब सा ही लगा .... मेरे आंकलन अनुसार इसका मुख्य कारण ये रहा कि मोदी जी ना तो अंग्रेजी में पारंगत हैं ना ही उनका उच्चारण दोष रहित या ही  कर्णप्रिय है !!!!
पर फिर भी क्योंकि शायद ज्यादातर वैज्ञानिक दक्षिण भारत एवं गैर हिंदीभाषी क्षेत्रों से आते हैं जिनके लिए हिंदी समझना मुश्किल होता है इसलिए उन्होंने अंग्रेजी में भाषण देना उचित समझा होगा - जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए !!!!
पर फिर एक प्रश्न भी उठता है कि मोदी जी के UN में दिए भाषण को हिंदी में होने के कारण बढ़-चढ़ कर क्यों सराहा गया था ?? शायद भक्तों और मोदी समर्थकों और अन्य भारतियों ने यही तो कहा था कि इससे हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी का मान बढ़ता है - आदि !!!!
तो क्या अब मापदंड भी बदल तो नहीं गए ? या माना जाए कि मोदी जी के भाषण की भाषा हिंदी होने के आधार पर सराहना बेमानी और मिथ्या थी ?? क्या फरक पड़ता था यदि मोदी जी UN में भी भाषण अंग्रेजी में ही दे देते ?? पर फरक तो पड़ा था !!!! है ना !!!!
तो फिर तो सुविधानुसार मापदंड ही औने-पौने बदल गए लगते हैं ....

Friday, 2 January 2015

//// आज मैंने भी "मॉक ड्रिल" करी .... मुझे अच्छा लगा .... ////

गुजरात पुलिस की 'मॉक ड्रिल' में दयनीय एवं आपत्तिजनक मानसिकता देखने को मिली - वही सड़ांघ मारती घिनौनी साम्प्रदायिकता की मानसिकता ....
मित्रों प्रतिक्रिया स्वरुप आज मैंने भी गुजरात की भाजपा सरकार के अघीन गुजरात पुलिस और साम्प्रदायिकता की बीमारी से ग्रसित उन भाजपाइयों और भक्तों और तनातनी हिन्दुओं और वाहियात मुसलमानों के विरुद्ध 'मॉक ड्रिल' करी - जी हाँ - // गालियां देने की 'मॉक ड्रिल' //
जैसे कि यदि ये पुल्लू के अट्ठे मेरे सामने पड़ जाएँ तो मैं इन्हे चुन-चुन कर कौनसी गालियां दूंगा ??
मेरा यकीन करें .... मैंने कल्पना करी ये लड़ रहे थे चिल्ला रहे थे - मेरा हिन्दू धर्म सबसे अच्छा - मेरा इस्लाम सबसे अच्छा - और मैं इन्हे नायाब गालियों से ज़लील करने की 'मॉक ड्रिल' कर रहा था ....
चुप स्साले - नामुराद झकोरे - अधर्मी कीड़े - इंसानियत के दुश्मन ....!@#$%&?  आदि इत्यादि !!!!
सच कहता हूँ कस्सम से मेरी सफल 'मॉक ड्रिल' के बाद मैं कुछ हल्का महसूस कर रहा हूँ - मुझे लग रहा है कि मैंने भी अपने सामाजिक दायित्व के निर्वहन करने का प्रयास किया है ....
आप से भी अनुरोध है कि आप भी अपने सामाजिक दायित्वों के निर्वहन करने और इंसानियत को ज़िंदा रखने का प्रयास करते रहें ....
धन्यवाद !!!!

//// नई नीति की योजना ? या नई योजना की नीति ?? या सब बकवास ???....////

सरकार की नयी घोषणा - 'योजना आयोग' अब 'नीति आयोग' कहलायेगा !!!!
अंग्रज़ी में "Planning Commission" अब कहलायेगा - "NITI (National Institution for Transforming India) आयोग" !!!!
मेरे प्रश्न .... इस नीति और योजना विहीन सरकार से - कुछ विवेचना के साथ >>>>
> अब योजना कौन बनाएगा या केवल नीति बनाने से काम चल जाएगा ?
> क्या 'नीति आयोग' योजना नहीं बनाएगा ?
> क्या 'योजना आयोग' नीति नहीं बनाता था या बना सकता था ?
> क्या नीति बनाना योजना बनाने से ज्यादा जरूरी है ?
> क्या नीति बनाने में बहुत समय लगता है और ये एक पूर्णकालिक कार्य है ?
> क्या ये सरकार और इसका 'नीति आयोग' अगले पूरे पांच साल नीतियां ही बनाता रहेगा ?
> क्या नीति बनाई भी जाती है ? या ये बस होती भर नहीं है ?? जैसे ईमानदारी पर चलने की नीति - सबको साथ लेकर चलने की नीति - सभी धर्मों का आदर करने की नीति - ना खाऊंगा ना खाने दूंगा की नीति - 'मेक इन इण्डिया' की नीति - सत्य पर चलने की नीति - स्वराज की नीति ?
> क्या ये सरकार अभी तक बिना नीति के चल रही थी ?
> क्या इस सरकार को अभी 7 महीने में अपनी नीतियां सहीं नहीं लगी थीं ?
> क्या किसी संस्था का नाम भर बदलने से काम भी बन जाएगा ?
> क्या अंग्रेजी के 4 Letters N I T I को मिला हिंदी शब्द 'नीति' का नाम देने का मतलब वाकई हिंदी के शब्द 'नीति' और अंग्रेजी के शब्द 'POLICY' से ही लेना देना है - या शब्दों का घालमेल ????
ऑफ़ ओह .... मैं भी आवेश में यूं ही कितने प्रश्न पूछ बैठा ... और वो भी किस से ????
जिसकी 7 माह में भी ना कोई नीति दिखी ना ही योजना ....
बस कुछ था तो - हवाबाजी - लोगों को बेवकूफ बनाने के नित नए हथकंडे - निर्लज्जता के साथ साम्प्रदायिकता को हवा देना - धोखा - और नए नए वादे - नए नए सब्जबाग - नए नए पैंतरे - जहाँ चुप्पी की दरकार थी वहां बड़बोलापन - जहाँ बोलना अपेक्षित था वहां चुप्पी !!!!
मेरे आंकलन अनुसार इस सरकार को नीति और योजना से अव्वल एक अच्छे ईमानदार नेतृत्व की जरूरत है - और जरूरत है बुरे सांसदों से छुटकारा और अच्छे सांसदों का समावेश ....
मेरा यकीन मानें - सही नीति और उचित योजना अपने आप मूर्त रूप ले लेगी ....
फिर आप संस्थाओं का नामकरण लफ़्फ़ाज़ी के साथ कुछ भी करें ....
"NITI (National Institution for Transforming India) आयोग"
......................... या ........................
"FAKU (Federal Administration & Knowledge Usage) आयोग"

Thursday, 1 January 2015

//// इंसानियत के हिमायतियों को सच्चे दिल से नववर्ष की शुभकामनाएं .... ////

जब राजनीति और धर्म का घालमेल हो जाए तो इंसानियत शर्मिंदा होती ही है ....
और मैं ये पुनः होता देख रहा हूँ ....
मैं निराशावादी नहीं - पर बिना वजह आशा का कंबल भी नहीं ओढ़ सकता हूँ ....
मैं बद्तमीज़ भी नहीं - पर सभी अच्छे बुरों को शुभकामनाएं भी तो नहीं दे सकता ....
इसलिय आज अपने दिल पर पत्थर रख मैं उन सभी इंसानियत के दुश्मनों के लिए कहने पर मजबूर हूँ कि - आपको शुभ-काम-ना-आएं !!!!
और हाँ इस नववर्ष की सुहानी सुबह आप सभी इंसानियत के हिमायतियों को दिल से कहना चाहता हूँ कि - आपको शुभकामनाएं !!!! हार्दिक शुभकामनाएं !!!! बहुत बहुत शुभकामनाएं !!!!