Thursday, 13 September 2018

// जैसे केजरीवाल एक पढ़े-लिखे शहरी हैं.. तो वो अनपढ़ गँवार नहीं हुए क्या ??.. //


इस बार एक बड़बोले कोंग्रेसी ने मोदी को अनपढ़ और गँवार कह दिया है..

और भक्त छुई-मुई हुए जा रहे हैं.. गुस्सा कर रहे हैं.. बौखला रहे हैं.. बुरा मान रहे हैं.. फोकट दिल पर ठेस लगा रहे हैं..  जैसे कि कुछ बिलकुल गलत या अनर्थ कह दिया हो..

अब यदि मोदी अनपढ़ नहीं हैं तो केजरीवाल को रोल नंबर बता दें.. डिग्री घर पहुँचने की सुविधा हो गई है.. बस डिग्री घर पहुँचते ही सबको बता दें..

पर डिग्री हो तो ना.. डिग्री तब हो जब एग्जाम दिए होते.. एग्जाम तब दिए होते जब पढ़ाई लिखाई किए होते.. और पढ़ाई लिखाई किए ही नहीं थे तो - अब अनपढ़ ही तो कहलाओगे ना..

और वैसे भी क्योंकि मैं खुद पढ़ा लिखा हूँ इसलिए मुझे नहीं लगता कि मोदी पढ़े-लिखे हैं.. क्योंकि खाए के गाल नहाए के बाल और पढ़ेलिखे की चाल ढाल अलग से ही समझ आ जाती है..  

और हाँ गंवार का मतलब मालुम है.. कसम से डिक्शनरी देख के बता रहा हूँ - गाँव का रहने वाला..

और मोदी जी तो खुद कह चुके हैं कि वो वडनगर के रहने वाले हैं - और वडनगर शर्तिया एक गाँव है कोई स्मार्ट सिटी तो है नहीं.. तो फिर मोदी को गँवार कह दिया तो क्या गलत कह दिया ??..

अच्छा क्या शहरी कहते तो ठीक रहता ??.. शहरी अनपढ़ ??..

नहीं यार ये शहरी या अर्बन अनपढ़ तो जमता नहीं.. क्योंकि शहरी होते हुए भी यदि कोई अनपढ़ रह जाए तो ये तो फिर गाली जैसा ही लगता है.. अर्बन नक्सली से भी नीच गाली जैसा.. इससे तो फिर गँवार अनपढ़ ज्यादा लॉजिकल और सरल संभावित सा लगता है..

इसलिए मेरी भक्तों को समझाइश है कि पूरे मसले पर किसी समझदार से मार्गदर्शन प्राप्त करें और विमर्श करें कि मोदी अनपढ़ गँवार नहीं हुए क्या ??.. ठीक वैसे ही जैसे अरविन्द केजरीवाल एक पढ़े-लिखे शहरी हैं..

अब हैं तो हैं.. सत्य को कब तक झुठलाओगे..
समझे प्यारे अनपढ़ शहरी और पढ़ेलिखे गँवार भक्तों !!

ब्रह्म प्रकाश दुआ
'मेरे दिमाग की बातें - दिल से':- https://www.facebook.com/bpdua2016/?ref=hl

उसने 'बर्बादी' का नाम 'विकास' रखा है..


// भक्तों के कारनामें !!.. संघ राजनीति में दखल दे सके - इस लायक भी ना छोड़ेंगे !!..//


कुछ कहते थे कि २०१४ हारे तो कांग्रेस ख़त्म हो जाएगी..
अब कुछ कह रहे हैं कि यदि २०१९ मोदी हारे तो भाजपा ख़त्म हो जाएगी..   

और कुछ कह रहे हैं कि २०१९ मोदी जीते तो प्रजातंत्र ख़त्म हो जाएगा..
और कुछ तो यहां तक फेंक दिए हैं कि भाजपा को ५० साल तक कोई हरा ही नहीं पाएगा.. 

और मेरा कहना है कि २०१९ मोदी हारनेवाला है..
५० साल वाला फेंकू जुमला तड़ीपार होने वाला है.. 

परन्तु ना तो कांग्रेस ना भाजपा ना प्रजातंत्र ख़त्म होने वाला है..

ख़त्म होगा तो बस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राजनीति में बढ़ता दखल और प्रभाव..

कारण ??..
संघ के मक्कारी हिसाब से संघ कभी भी राजनीतिक दखल नहीं करता..
और भक्तों की पूरी कोशिश है कि संघ सर्वोपरि रहे.. उसकी हर बात सही साबित हो..

और जाने अनजाने भक्तों के कारनामें भी इसी दिशा में किए जा रहे दीनदयाली प्रयास जैसे ही हैं..

यानि भक्तों के कारनामें कुछ यूँ ही हैं कि..
संघ राजनीति में दखल दे सके - इस लायक भी ना छोड़ेंगे..
भक्त तो डूबे हैं सनम - संघ को भी ले डूबेंगे..

तो आइए कहें - सबका साथ सबकी आवाज़.. आमीन !! आमीन !! आमीन !! ..

ब्रह्म प्रकाश दुआ
'मेरे दिमाग की बातें - दिल से':- https://www.facebook.com/bpdua2016/?ref=hl

Wednesday, 12 September 2018

और कौन-कौन मिला हुआ था ??..


// पिछले ४ साल में क्या हुआ ??.. ..//


परेशानी इस बात की हुई..
तेल में आग लगी डॉलर ७३ का हुआ..

तरस इस बात पर हो आया..
भक्त इस पर भी बेहद खुश हुआ..

पर अफ़सोस तो बस इस पर हुआ..
जो होना था बस वही नहीं हुआ..

और गुस्सा इस बात पर उगल आया..
धर्म जाति का धड़ल्ले से धंधा हुआ..

(ब्रह्म प्रकाश दुआ - १२/०९/१८)

// वाह क्या बंदी है - और क्या घेराबंदी है.. अभी तक सवालों के ही घेरे में ??.. ..//


स्मृति ईरानी ने बताया है कि..
राहुल गांधी हेराल्ड केस में सवालों के घेरे में हैं..

अब इनके बारे में क्या कहें.. ..

स्मृति ईरानी तो सारे घेरे तोड़कर कब से बाहर आ चुकी हैं..
और मोदी तो निःशब्द "शून्य" के घेरे में ही चल रहे हैं..

और शाह और गडकरी और जेटली और नड्डा के अलावा भी कई मंत्रियों और मंत्राणियों के घेरे भी बहुत बढ़ते जा रहे हैं - जिन्हें अपने पेट और अपनी औकात के नीचे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता.. और ये घेरे इनके झुकने में भी बाधक हो चुके हैं..
    
और मुझे तो देश के २ रक्षामंत्री निर्मला और पर्रिकर भी घिरे-घिरे ही दिखते हैं.. बेचारे - घेरे में घुसेड़े लाचारे !!..

इसलिए स्मृति ईरानी को घेरते हुए आज तो कहना ही पड़ेगा कि..

वाह क्या बंदी है - और क्या घेराबंदी है.. अभी तक सवालों के ही घेरे में ??..
हा !! हा !! हा !!..

ब्रह्म प्रकाश दुआ
'मेरे दिमाग की बातें - दिल से':- https://www.facebook.com/bpdua2016/?ref=hl

Tuesday, 11 September 2018

// प्रजातंत्र के शेरुओं कुत्तों गधों का विश्लेषण.. और पेट्रोल डीज़ल का चार्ट.. ..//


याद है ना !!.. पद्मावती पद्मावत !!.. ये करणी सेना को हिंदुत्व को ज़िंदा करने या रखने के नाम से किसने और क्यों उकसाया और मोर्चे पर लगाया था ??..
और आज वही करणी सेना भाजपा और भक्तों के विरोध में सड़कों पर उतर चुकी है.. इस बार हिन्दू दलित-हिन्दू सवर्णों के झगडे में हिन्दू सवर्णो के पक्ष में..

और ये सब इसलिए हो पा रहा है कि देश में प्रजातंत्र है.. और इसलिए कुछ भी करने की छूट प्राप्त है.. और कुछ तो भी कहने की भी..

इसलिए ही तो प्रजातंत्र में ताज़ा-ताज़ा उल्लेख शेर और कुत्तों का हुआ है.. और उल्लेख किया है भक्तों के बाप के बाप यानि "दादा" ने.. जिन्होंने अब हिन्दुओं की एकता की वकालत की है और सभी हिन्दुओं को एक रहने की सलाह और समझाइश भी दी है.. और विचित्र दलील ये दी है कि यदि जंगल में शेर अकेला ही चल देगा तो कुत्तों का झुण्ड उस पर हमला कर उसे मार भी सकता है..

बस इसलिए ही कहता हूँ और भक्तों को समझाता हूँ कि शेर या शेरू होने या होने का भ्रम पालने से कुछ नहीं होता.. और हर बार कुत्तों की बात करने से भी कुछ हासिल नहीं होता.. क्योंकि कई बार तो शेरू को गधों से प्रेरणा लेते हुए भी पाया गया है..

इसलिए यदि प्रजातंत्र की बस्ती या जंगल को समग्र रूप से समझना हो तो मेरी बात समझो..
ये जो गधे और कुत्ते वगैरह हैं न ये प्रजातंत्र में बाहुल्य में पाए जाते हैं - जंगलों में भी बस्तियों में भी.. पर प्रजातंत्र के जंगल में कोई शेर वेर नहीं होता.. और कोई राजा वाजा भी नहीं होता.. होता है तो बस कोई सेवक जैसा प्रधानसेवक या चौकीदार टाइप ठोला..

और सबसे अव्वल बात तो यही है कि यदि गधा अपने आपको शेर समझ बैठे तो वो शेर हो नहीं जाता.. उसे तो कुत्ते ही निपटा देते हैं.. और जंगल में ये जो झुण्ड या भीड़ होती है ना वो शेरों की नहीं हुआ करती बल्कि वो तो कुत्तों की ही हुआ करती है जो अकेले में गुर्राते भौंकते हैं और जब एक हो जाते हैं तो कुत्तई पटक मारते हैं..

वैसे गधों के भी अपने झुण्ड रहते ही हैं.. जो भले ही काटने की क्षमता नहीं रखते हों और कुत्तों को निपटाने की औकात भी नहीं.. पर वो ढेंचू ढेंचू की पुरजोर आवाज़ करते रहते हैं.. सरपट दौड़ लगाते रहते हैं.. धूल के गुबार भी उड़ाते रहते हैं..

और इसलिए यदि अब हम जंगल से बाहर निकल बस्ती की बात भी करें तो मेरी समझाइश कुछ यूं बनती है कि..
हर मोर्चे पर हर बार कुत्ते या गधे लगाने से कुछ हासिल नहीं होता.. कभी कहीं गधे तो कभी कहीं कुत्ते लगाने पड़ते हैं.. और कभी कभार घोड़े या सांड भी छोड़ने पड़ते हैं..

और ये जो शेर होता है ना वो जंगल का प्राणी है.. ये इंसानों की बस्तियों में स्वच्छंद विचरण नहीं करता है जैसा कि कुछ गधे कल्पना और वर्णन करते हैं.. और यदि कोई शेर इंसानों के इलाके में घुस भी आए ना तो इंसान उसे गोली मार देते हैं.. या बेहोशी का इंजेक्शन शूट कर पिंजरे में बंद कर ज़ू में गधों कुत्तों बंदरों सूअरों के साथ ही रख देते हैं.. समझे बेवकूफों !!..

और बेवकूफों यह भी समझ लेना कि ये जो कुत्तों के झुण्ड होते हैं न वो तो जंगलों में भी और बस्तियों में भी पाए जाते हैं.. और गधों के झुण्ड भी.. इसलिए बेहतर होगा कि जंगल से बाहर निकल जानवरों जैसे जानवरों की बात करने के बजाय इंसानों की बस्ती के बारे में यथार्थ बातें की जाएं.. बिलकुल इंसानों जैसे - ना कि गधों कुत्तों जैसी..

मसलन यदि पेट्रोल और डीज़ल का कोई चार्ट भी बनाए हैं तो इंसानों जैसा तो बनाओ.. ये गधों की अक्ल के हिसाब का बना फिर शेर शेरू चिल्लाने और कुत्तों जैसे भोंकने से क्या फायदा होगा ??..

अब तो समझे ना.. और यदि नहीं समझे तो बताना कि "दादा" की बात समझ पड़ गई थी क्या ??.. हाहाहाहाहा !!..

ब्रह्म प्रकाश दुआ
'मेरे दिमाग की बातें - दिल से':- https://www.facebook.com/bpdua2016/?ref=hl