Friday, 7 December 2018

// 'भानुमति के कुनबे' वाला गप्पू - पप्पू के 'कुनबे' पर इतना हलाकान क्यों हुआ रे ??.. //


और आज अंततः ५ राज्यों के प्रतिष्ठा के चुनाव निपट जाएंगे.. या सही मायने में कहूँ तो 'अप्रतिष्ठा' के चुनाव निपट जाएंगे !!..
और ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जो तथाकथित महारथी चुनाव मैदान में थे उनकी प्रतिष्ठा तो पहले से ही बची नहीं थी - और इस चुनाव में उनकी अप्रतिष्ठा के ही और खुलकर सामने आने और घटने बढ़ने के आसार थे..

और हुआ भी ऐसा ही.. इन चुनावों में हमारे गप्पू जी की अप्रतिष्ठा बहुत उचक गई - और हमारे पप्पू जी की अप्रतिष्ठा थोड़ी कम हुई..

ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस चुनाव में एक बार फिर राज्यों से संबंधित मूल मुद्दे अलग हटा दिए गए और चुनाव को केंद्रित कर दिया गया 'गप्पू' और 'पप्पू' के बीच.. पप्पू के कुनबे और गप्पू चौकीदार की चोरी के बीच..

और पप्पू ने इस बार गप्पू को अच्छा धोया और इतना तो धो ही दिया जिसका अनुमान शायद किसी को नहीं था..
और जैसा कि अनुमान था अपने गप्पू जी पप्पू के 'कुनबे' को ही कोसते रहे.. और ये बताने के बजाय कि उनके कुनबे ने क्या किया वो ज्यादातर दूसरों के कुनबों की आलोचना करते रहे..

और शायद जाने अनजाने - स्वतः या चक्रव्यूह में फंसे - या अपनी प्रकृति एवं विकृति अनुरूप - गप्पू जी बस यही गलती कर गए.. 'कुनबों' की बातों में ही उलझ कर रह गए..

क्योंकि ये तो सत्य है कि "कांग्रेस एक कुनबा है" - और सत्य ये भी है कि ये एक खालिस और प्रतिष्ठित कुनबा है - और इसकी शुरुआत मोतीलाल नेहरू या फिर जवाहर लाल नेहरू से होती है जिन्होंने इस देश के लिए जब शानदार कामों की शुरुआत की थी - तब ना तो गप्पू और ना ही पप्पू पैदा हुए थे..

पर ये जो गप्पू है ना - अव्वल तो इसका कोई कुनबा ही नहीं है.. और यदि है तो उसे 'भानुमति का कुनबा' कहा जा सकता है.. क्योंकि इधर उधर से दो चार संघियों के नाम लेते तो हैं पर वो भी प्रतिष्ठा की कसौटी पर सही नहीं उतर पाते.. और ये उनका कोई योगदान भी प्रस्थापित सिद्ध नहीं कर पाते - उलटे जब उनके कारनामों का ज़िक्र भी होने लगता है तो ये अपनी और अपनों की बगले झाँकने लगते हैं..

और इसलिए मुझे लगता है कि इस बार गप्पू जी समझदारों के उस सिद्धांत से भी पटखनी खा गए जो कहता है कि तुम उस विधा या विषय की बहस या प्रतिस्पर्धा में कदापि ना उलझो या उतरो जिसमें तुम बहुत कमज़ोर हो..

और इसलिए अंततः चुनाव के निपटने के साथ ही मेरा प्रश्न भक्तों के लिए.. ..

ये 'भानुमति के कुनबे' वाला गप्पू फुदक उचक पप्पू के 'कुनबे' पर इतना हलाकान क्यों हुआ रे ??..
और जब केंद्र और राज्यों में गप्पू के भानुमति के कुनबे वालों की ही सरकारें थीं.. तो राज्यों के नेतृत्व पर और सामयिक मुद्दों पर और केंद्र पर अपनी उपलब्धियों पर फुदका उचका क्यों नहीं ??.. जबकि फ़ोकट हवा में फुदकना और उचकना तो गप्पू की फितरत में है !!..

और भक्त कुछ कहें इसके पहले एक जवाब मैं ही दे देता हूँ.. गप्पू अबकी बार हवा में उचका फुदका इसलिए नहीं क्योंकि हवा बहुत खराब थी.. हा !! हा !! हा !!..

ब्रह्म प्रकाश दुआ
'मेरे दिमाग की बातें - दिल से':- https://www.facebook.com/bpdua2016/?ref=hl

Thursday, 6 December 2018

// 'पुलिस रिफॉर्म्स' चाहिएं ?? तो पहले हानिकारक मोदी जैसों को तो हटाना ही होगा....//


कोई ज़माना था कि पुलिस को देख हमें सुरक्षा की भावना का एहसास हो जाता था.. और शायद अपराधियों को एक डर लगने लगता था - पिटने और जेल जाने का..

फिर कुछ ऐसा हुआ कि हमें पुलिस को देखते ही डर लगने लगा कि अब तो फंसे इनके चंगुल में.. और अपराधियों को पुलिस देख एक सुकून मिलने लगा और याराना भाव की अनुभूति ..
लेकिन तब भी पुलिस का अपना एक रुतबा तो कायम ही था.. है ना !!..

लेकिन देखते ही देखते.. अब तो नौबत यहां तक आ गई है कि.. पुलिस को देखते ही या तो घृणा या गुस्से या बेचारगी या डर या तिरस्कार का एहसास होता है.. और सुरक्षा गई तेल लेने - अच्छे से अच्छा शरीफ थर-थर कांपने लगता है.. और जब उसे पुलिस के चंगुल में फंसने का एहसास हो जाता है तो उसे तड़प कर किसी नेता का ख्याल आता है या फिर रिश्वत देकर छूटने का..

यानि आजकल नेता जो हैं ना - वो हमारी पुलिस से ऊपर हैं पुलिस के माई-बाप हैं और पुलिस को कब्जाए बैठे हैं..

और क्योंकि नेता भ्रष्ट हैं दुष्ट हैं निर्मोही हैं और जुगाड़ू भी.. इसलिए अब पुलिस के सभ्य समाज में और सुचारू व्यवस्था में कोई उपयोगी मायने ही नहीं बचे हैं..

और नौबत यहाँ तक हो आई है कि पुलिसवाला बेचारा नेता के कहे पर चले तो मुश्किल क्योंकि तब वो अपनी पुलिसिया ड्यूटी का निर्वहन नहीं कर पाएगा और ब्लैकमेल हो नेता की तगड़ी गिरफ्त में आ जाएगा.. और यदि उसने नेता के कहे पर चलने से इंकार कर दिया तो वो मारा जाएगा..

और बेचारा 'सुबोध' मारा गया !!!!..

और ये तो अब सामान्य सी बात होने लगी है.. और कल कई और पुलिसवाले मारे जाएंगे.. और सब चुप रह जाएंगे.. ठीक वैसे ही जैसे कई सरकारी कर्मचारी और अधिकारी डर डर के मजबूरन अपराध करते या अपराधियों का साथ देते या अपराध और अपराधियों से मुहं मोड़कर चुपचाप जी रहे हैं - या फिर दिलेरी या कर्तव्यपरायणता दिखाने पर सताए या मार दिए जा रहे हैं..

तो फिर इसका इलाज क्या है ??..

इसका इलाज ये है कि बहुप्रतीक्षित बहुचर्चित वांछित 'पुलिस रिफॉर्म्स' को तत्काल अमली जामा पहनाया जाए.. और इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले तो मोदी जैसे हानिकारक नेता को प्रधानमंत्री पद पर से हटाया जाकर एक शुरुआत की जाए.. और फिर उम्मीद लगाई जाए कि जो अगला आएगा वो ईमानदार कामदार दमदार जानदार शानदार होगा.. क्योंकि उम्मीद पर ही दुनिया टिकी है और अच्छी शुरुआत के बिना अच्छे अंजाम की कल्पना भी नहीं की जा सकती है..

तो यदि आप चाहते हैं कि पुलिस वैसी ही हो जैसी बीते ज़माने में होती थी या फिर अपेक्षा के अनुरूप पुलिस आपके हक़ में और अपराधियों और घिनौने नेताओं के विरुद्ध रीढ़ की सीधी हड्डी के साथ खड़ी रह सके तो.. तो बस एक छोटी सी शुरआत तो करनी ही पड़ेगी और मोदी को हटाना होगा.. बाकी मर्ज़ी आपकी - और यदि कोई और विकल्प आपके पास हो तो आपको मुबारक !!..

ब्रह्म प्रकाश दुआ
'मेरे दिमाग की बातें - दिल से':- https://www.facebook.com/bpdua2016/?ref=hl

Wednesday, 5 December 2018

// 'हिन्दू'>'हिंदुत्व' की तर्ज़ पर अब..'भारत माता की जय'>'भारत्व मातृत्व की जय' ??..//


वैसे तो हमारे देश 'इंडिया' और 'भारत' का नाम 'हिन्दुस्तान' भी है - और इसलिए ये देश ऑटोमेटिकली और बिना किसी कन्फ्यूज़न के 'हिन्दू' से जुड़ा जुडाया माना जा सकता है - और मैं भी पैदाइश से ही ये 'हिन्दू' और 'हिन्दुस्तान' शब्द सुनता भी आया था और काफी कुछ समझता भी आया था..

पर मोदी सरकार के आने के बाद ये 'हिन्दू' शब्द कुछ ज्यादा ही सुनने में आया - और मेरी समझ में ये नहीं आया कि इसके मायने जब सर्वविदित हैं तो फिर नए सिरे से इसे समझाने की कोशिश या इसे परिभाषित करने की मूर्खता या इस पर नाहक बहस क्यों की जा रही है ??..

पर फिर थोड़ा गौर करने पर 'हिन्दू' पर बहस का कारण समझ आया - जब 'संघ विचारक' नाम से कुछ संघियों को टीवी डिबेट में यह कहते सुना कि 'हिन्दू' का मतलब समझने के लिए पहले आपको ये समझना होगा कि 'हिन्दू' और 'हिन्दुत्व' में अंतर है - और 'हिन्दुत्व' के क्या मायने होते हैं.. और फिर धर्म के नाम पर राजनीति और नंगा नाच भी शुरू हुआ.. और मुझे ये भी पक्का हो गया कि ये जो 'संघ विचारक' हैं वो निहायत संकीर्ण विचारों के होते हुए केवल संघ पर ही विचार कर सकते हैं - इंसानियत पर विचार करना तो उनके बस की बात ही नहीं..

बहरहाल.. पूरे देश को 'हिन्दू-हिंदुत्व' के चक्कर में उलझाते हुए साथ ही साथ राष्ट्रीयता की भी बातें खूब होने लगीं - और इसी दौरान 'वन्दे मातरम्' और 'भारत माता की जय' पर भी गजब की सियासत पेली जाती रही.. और गुरु घंटालों द्वारा घंटों की सारहीन हास्यास्पद टीवी बहस भी होती रही - इस मकसद के साथ कि - 'हिन्दू-हिन्दुत्व' के तड़के के साथ राष्ट्रवाद या राष्ट्रप्रेम के नाम पर छलावे से देश में साम्प्रदायिकता का ज़हर घोला जाए..

और अब जाकर पप्पू ने इस बहस को और गरमा दिया - इसे नया तड़का मारकर..
पप्पू ने कह दिया कि - गप्पू हमेशा हर रैली में 'भारत माता की जय' तो बोलते रहते हैं पर उन्हें 'भारत माता' के मतलब भी नहीं मालुम.. और फिर गप्पू ने भी पलटवार किया और फुस्सी दहाड़ मार दी कि - अब पप्पू हमें बताएंगे 'भारत माता' के मतलब ??.. और 'भारत माता की जय' बोलने के लिए क्या नामदारों से इज़ाज़त लेनी पड़ेगी ?? - आदि - और हमेशा की तरह बकवास से भरपूर अनादि !!..

मेरी प्रतिक्रिया..

गप्पू को पप्पू की बात को समझना होगा और मेरी बात को भी - क्योंकि आखिर गप्पू ने देश की चौकीदारी करने का बीड़ा जो अपने कमज़ोर कांधों पर उठा रखा है..

और मेरी बात संघ के विचारकों की ही तर्ज़ पर कुछ यूँ है कि.. गप्पू चौकीदार जी !!.. 'भारत' को समझने के लिए सबसे पहले 'भारत्व' भी कुछ होता है ये समझना होगा.. और जब 'भारत्व' का मतलब समझ पड़ जाए तो फिर 'माता' और 'मातृत्व' क्या होता है यह भी समझना होगा..

और आप जैसे बिगड़ैल अज्ञानी को समझाने के लिए आज पहला त्वरित पाठ.. ..
भारत-इंडिया-हिन्दुस्तान मतलब हमारा देश मतलब हमारा राष्ट्र यानि 'नेशन'.. और इसलिए जैसे नेशन का 'नॅशनलिस्म' और 'हिन्दू का 'हिन्दुत्व' या 'हिन्दुइस्म' होता है वैसे ही 'भारत' का 'भारत्व' हो जाएगा.. और जिस दिन तुम्हें ये 'भारत्व' या 'नॅशनलिस्म' या 'राष्ट्रवाद' का मतलब समझ पड़ जाए - बस उसी दिन इस देश की किसी भी माँ के पास - जिसने अपना बेटा सांप्रदायिक दंगो की भेंट चढ़ते देखा हो - जाकर बैठ जाना.. शायद तुम्हें 'माता' और 'मातृत्व' का सही ज्ञान भी मिल जाए !!..

और ज्ञान प्राप्ति होते ही जय जय चिल्लाना जयकारे लगाना..
'भारत माता की जय' - 'भारत्व मातृत्व की जय' - और इसका मतलब 'संघ विचारकों' को भी समझा देना.. ' समझे गप्पू जी !!..

(टीप : यह पूरा बकवास लेख - देश में हो रही पूर्ण बकवास पर ही आधारित है)

ब्रह्म प्रकाश दुआ
'मेरे दिमाग की बातें - दिल से':- https://www.facebook.com/bpdua2016/?ref=hl

Tuesday, 4 December 2018

// 'शहीद सुबोध' को श्रद्धांजलि देते समय 'अख़लाक़' को भी याद कर लीजिएगा !!.. ..//


देश ने पिछले दिनों देखा कि गौहत्या का मुद्दा कई इंसानों की हत्या का कारण बना.. पर ना तो गौहत्याएं रुकीं और ना ही इंसानों की हत्याएं..

और अभी फिर बुलंदशहर में एक पुलिस इंस्पेक्टर की भी हिंसक भीड़ ने हत्या कर दी.. और शायद इस ५६ इंची नाकारा सरकार के रहते - और शायद हो सकता है उसके बाद भी काफी समय तक - अब उन्हीं शर्मनाक कारणों से ऐसी ही हत्याएं होती रहेंगी..

ऐसा क्यों ??..

ऐसा इसलिए क्योंकि मुझे लगता है ऐसा ५६ इंची नाकारा सरकार के संरक्षण में एक सोची समझी चाल के तहत ही शुरू किया गया था.. और भीड़ के उन्माद और दिमाग के दिवालियेपन का फायदा उठा भीड़ को उकसा कर ही ये सब वहशियाना हरकतों को अंजाम दिया या दिलवाया गया था..

और मेरी नज़र में भीड़ की याददाश्त तो बहुत कम और कमजोर रहती है - पर भीड़ की आदत बहुत पक्की सी हो जाती है..

और नतीजन.. योगी जब राजस्थान में हनुमान जी की जाति की विवेचना करते हुए चुनावी छल्लों में लिप्त अपना सरकारी काम करते हुए सदैव की तरह अपने उत्तरदायित्वों के तथाकथित निर्वहन करने का ढोंग कर रहे थे - शायद तब ही उनके तथाकथित उज्जवल 'उत्तरप्रदेस' के बुलंदशहर में सुबोध नामक एक पुलिस इंस्पेक्टर - जो गौहत्या की ही एक वारदात विषयक अपनी ड्यूटी निभाने के अपने उत्तरदायित्वों का ईमानदारी और बहादुरी से निर्वहन कर रहे थे - एक उग्र सांप्रदायिक अंधों की भीड़ के हिस्से बने कुछ दंगाई टाइप की औलादों द्वारा शहीद किए जा रहे थे..

और मुझे लगता है कि भीड़ के कुछ हैवानों को तो कोई फर्क नहीं पड़ा होगा.. पर कुछ बिगड़ैल आदतों और धार्मिक चश्मे से हर घटना को देखने वालों को एहसास हो रहा होगा कि पहले तो मुसलमान मरे थे और अब तो हिन्दू भी मर रहे हैं - मसलन पहले तो अख़लाक़ मरे थे - अब सुबोध भी ??..

पर मैं तो यही सोच रहा हूँ कि गाय के नाम पर इंसानों की हत्या को जायज़ कैसे ठहराया जा सकता है ??.. पर अब हत्याएं तो होती रहेंगी.. क्योंकि भीड़ की आदत इतनी जल्दी कहाँ छूटती है - और विशेषकर तब जब भीड़ में असल गुनहगारों को अब तक उचित सजा ना देकर राजनाथ वाली कड़ी से कड़ी सजा देने की ही बात कही गई हो.. ..

बस मैं इसलिए ही कहता हूँ कि रवीश कुमार को सुनते रहिए !!.. और मान लीजिए कि ये ५६ इंची नाकारा सरकार के रहते आपको सजग रहना है और अपने दोस्तों और परिजनों को दंगाई बनाने से रोकना है..

और इसके लिए मैं सोचता हूँ कि समस्त साम्प्रदायिक अतिवादी संगठनों से अपने दोस्तों और परिजनों को बचाएं.. अन्यथा आपके कई अपने ऐसे ही बिलावजह मारे जाएंगे - और कईयों पर उनके मारे जाने के प्रकरण दर्ज हो वो कोर्ट कचहरी और नेताओं दलालों के चक्कर काट-काट कर अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर लेंगे..

और भूल कर भी कोई ये ना सोचे कि वो धर्म की रक्षा कर बहुत बहादुरी या पुण्य का काम कर रहा है.. क्योंकि वो असल में तो इंसानियत की हत्या कर रहा है..

इसलिए एक बार फिर कहूंगा - रवीश कुमार की कही गई हर बात को सुनते और समझते रहिए - और आज बहादुर सुबोध की शहादत पर ही सही अपनी बुद्धि का सदुपयोग कर अपने अंतर में झांकिए और कुछ बोध प्राप्ति की चेष्टा करते रहिए..

और हाँ 'शहीद सुबोध' को विनम्र श्रद्धांजलि देते समय धर्म और जाति का चश्मा उतार 'अख़लाक़' को भी याद कर लीजिएगा !!.. धन्यवाद !!

ब्रह्म प्रकाश दुआ
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Monday, 3 December 2018

// विवादित स्थल पर मस्जिद या नमाज़ अदा करना हराम.. पर मंदिर चलेगा ??.. ..//


मुझे शहर से २५-३० किलोमीटर दूर एक रेस्ट हाउस में मित्रों की वो दाल-बाटी की पार्टी बार-बार याद आ रही है जिसमें ३ मित्रों को दारू भी लाने की जिम्मेदारी दी गई थी - और उनमें से एक ही पहुंचा और दो हो लिए गायब.. मतलब दारू की शॉर्टेज हो गई थी.. और ऐसी विकट परिस्थिति में एक दारूकुट्टा मित्र एक-आध पेग लगा कर दूसरे को समझा रहा था.. अबे साले तू मत पी - तुझको स्कूटर चला के घर भी वापस जाना है.. ..

पर जनाब जब उससे ये पूछ लिया गया कि यार तुझको भी तो मोटर साइकिल चलाकर घर वापस जाना है तो वो बोला - मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता - बचपन से पीकर चला रहा हूँ.. और पार्टी में सभी मित्र हंस दिए.. और खूब ठिठोली जारी रही !!..

और आज मुझे वो बहुत पुराना वाकया इसलिए याद हो आता है क्योंकि - अभी कई टीवी डिबेट्स में मैने कुछ शानों को चिल्ला-चिल्ला कर ये कहते सुना कि.. तुम वहां मस्जिद बना ही नहीं सकते क्योंकि वो जगह विवादित है - और विवादित जगह पर ना तो मस्जिद बन सकती है ना ही नमाज़ अदा की जा सकती है.. ऐसा करना इस्लाम में हराम बताया गया है.. ..

और दम्भ के नशे में चूर मंदिर निर्माण करने के समर्थक जो ये बात पेलते हैं उनसे पलट कर कोई ये नहीं पूछता कि.. क्या विवादित स्थल पर मंदिर बनाया जा सकता है ??.. और पाठ पूजा अर्चना हो सकती है ??.. ..

और मुझे हमेशा लगता है कि यदि उनसे ऐसा पूछ लिया जाए तो शायद जवाब भी पूरी बेशर्मी से कुछ ऐसा-वैसा ही आएगा कि - हमें फर्क नहीं पड़ता - हमारे इसमें तो शुरू से ही ये सब चलता है.. या फिर हमेशा की तरह वाक्चातुर्य के सहारे या एंकर के सहारे मुद्दे को भटका अनाप शनाप बकना शुरू हो जाएगा.. ..

और अब मैं ये भी खुलासा कर दूँ कि जिस तरह से मैं दारू पीने को हानिकारक मानता हूँ.. वैसे ही मैं आज की स्थिति में किसी भी और धर्मस्थल का निर्माण करना या करवाना भी उपयुक्त नहीं मानता हूँ.. क्योंकि दारू पीने से बेहतर है आप उस पैसे से परिवार या समाज या स्वयं के लिए ही कुछ अच्छा करें - और धर्मस्थल बनाने से बेहतर है आप जनता की भलाई के लिए अस्पताल या स्कूल कॉलेज आदि का निर्माण करें या करवाने में सहयोग दें..

और शायद इसलिए ही दारू-दंगड़ का वो ठिठोली से भरपूर वाकया आज मुझे मंदिर मस्जिद के हो रहे झगडे-फसाद के समय निहायत प्रासंगिक हो बहुत गुदगुदाता भी है और लजाता भी है और आक्रोशित भी करता है..

शायद इसलिए भी कि मैं ना तो दारू पीता हूँ और ना ही मंदिर जाता हूँ..
और इसलिए यदि मैं किसी की भी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा रहा हूँ - तो हाथ जोड़कर अग्रिम रूप से माफ़ी मांगता हूँ..
धन्यवाद !!

ब्रह्म प्रकाश दुआ
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Saturday, 1 December 2018

कौन कहता है कि मोदी सरकार ने दलितों के लिए कुछ नहीं किया ??..


// भक्त नाहक परेशान ना हों.. मोदी के विकल्प के भी विकल्प ही विकल्प !!.. ..//


जब मोदी सत्ता में आए थे तो भक्त कहते थे.. मोदी के अलावा तो कोई विकल्प था ही नहीं !!..

पर जब १-२ साल बाद मोदी की कलई खुलने लगी तो भक्त कहने लगे.. मोदी अच्छे हैं और ठीक-ठाक काम कर रहे हैं - इसलिए अभी मोदी के विकल्प की आवश्यकता नहीं !!..

और जब २-३ साल बाद मोदी नाकारा साबित होने लगे तो भक्त कहने लगे.. विपक्ष में भी कोई काबिल नहीं - इसलिए अभी तो मोदी का कोई विकल्प नहीं - हो तो बताओ ??..

और फिर जब ३-४ साल बाद मोदी नाकारा और विफल साबित हो गए तो भक्त कहने लगे कि.. माना मोदी उतने सफल नहीं हो सके - पर यदि उनको हटाना हो तो फिर उनका कोई भी विकल्प हो तो सुझाओ.. क्या राहुल गांधी उनका विकल्प हो सकते हैं ??..

और फिर अब जब पूरे ४.५ साल बाद ये स्पष्ट होने लगा है कि मोदी तो हानिकारक हैं - तो भक्त अब दबी जुबान कहने लगे हैं कि.. अब करें तो क्या करें ??.. अब मोदी का भाजपा में भी कोई विकल्प नहीं दिख रहा !!..

और मुझे लगता है कि भक्त ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि शायद भक्तों को भी लगातार ताने और कटाक्ष और व्यंग्य और सत्य सुन-सुन कर - और हिकारत और हास्य के पात्र बनने के बाद ये अहसास हो गया है कि - क्योंकि सुषमा स्वराज जेटली राजनाथ गडकरी रविशंकर प्रसाद पियूष गोयल पर्रिकर अमित शाह आदि में कोई भी ऐसा नहीं है जो मोदी के समान लोगों को बेवकूफ बनाने की कला रखता हो.. इसलिए भाजपा में भी मोदी का विकल्प मिलना तो असंभव ही होगा..

और मैं भक्तों से पहली बार सहमत हो भक्तों को ढांढस बंधाते हुए उन्हें यह कहना चाहूंगा कि.. फिलहाल अपना संक्षिप्त दिमाग फ़ोकट खर्च मत करो और ये विकल्प-विकल्प रटना  बंद करो.. क्योंकि अब तो मोदी का जाना यूँ भी तय हो गया है.. और मोदी के जाने के बाद भारत जैसे देश में उनकी कुर्सी खाली रह जाए ऐसा तो असंभव ही है.. क्योंकि यदि कोई और नहीं मिलेगा तो भी - 'आप' तो है ना.. और यदि नहीं तो फिर हम तो हूँ ना !!.. अन्यथा वैसे तो भक्तों आप स्वयं भी कोई मोदी से बुरे नहीं - तो आप ही सही.. है ना !!..

ब्रह्म प्रकाश दुआ
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