Saturday, 20 January 2018

// भाजपाई-कॉंग्रेसी ज्यादा ही उत्साहित और 'आपियन्स' ज्यादा ही विचलित क्यों.. //


चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और राष्ट्रपति भी..
दोनों संस्थाओं के बीच कुछ पत्राचार का आदान प्रदान होता है - और जो पत्र चुनाव आयोग के द्वारा राष्ट्रपति को प्रेषित होता है उसका मजमून तत्काल ही सार्वजानिक हो जाता है.. और सार्वजनिक होते ही मीडिया में और सत्तापक्ष भाजपा और विपक्ष कॉंग्रेस में हर्ष उल्लास का छा जाना भी सार्वजनिक हो जाता है - और तत्काल बयानबाजी और जुमलेबाजी शुरू हो जाती है - और बिका हुआ ऊँघ रहा मुस्तैद मीडिया चाकचौबंद हो अपनीवाली पर आ जाता है..

और ये सब इसलिए होता है कि तथाकथित रूप से चुनाव आयोग के उस पत्र में राष्ट्रपति को 'आप' पार्टी के २० विधायकों की सदस्य्ता रद्द करने की सिफारिश की गई होती है.. और तत्काल ये मान लिया जाता है कि सिफारिश पूर्ण है उचित है न्यायसंगत है और वैधानिक भी है - और इसलिए मानने योग्य हो राष्ट्रपति द्वारा माननी ही पड़ेगी - और इसलिए मान ही ली जाएगी..

इसके इतर जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा पद्मावत के पक्ष में और ४ भाजपाई खुजली सरकारों के विरुद्ध निर्णय पारित होता है जो तत्काल सार्वजनिक होता ही है - तो उस विषयक सारी सरकारें और मीडिया भी उस निर्णय के अध्ययन में तल्लीन और ग़मगीन हो जाता है - और प्रतिक्रया देने तक से बचता फिरता है.. यानि मानों इन बेचारों के अस्तित्व की सदस्यता ही रद्दी हो गई हो..

खैर चुनाव आयोग के 'आप' विरुद्ध निर्णय के संदर्भ में मैं पाता हूँ कि सम्पूर्ण सत्तापक्ष और विपक्ष अत्यंत उत्साह दिखाने का प्रयत्न कर रहा है .. परन्तु मुझे यकीन है कि वो अंदर से इतना उत्साहित है नहीं.. कारण ये कि चूना आयोग सिद्ध हो चुके चुनाव आयोग के इस निर्णय या फैसले से भविष्य में इन सभी को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.. और जबकि इस निर्णय से 'आप' पार्टी का बाल बांका भी नहीं होने वाला..

पर इस निर्णय से 'आप' पार्टी के समर्थकों में मैं थोड़ी ज्यादा ही निराशा देख रहा हूँ.. जबकि मुझे नहीं लगता कि ये कोई बहुत बड़ी निराशा की बात सिद्ध होगी.. ये मैं इसलिए कह रहा हूँ कि यदि आपने जानबूझकर कोई गलती नहीं की है - और मान लें कि कोई गलती हो ही गई है.. तो इसमें निराश होने की आवश्यकता से अधिक सबक लेने की ही तो जरूरत है.. और यदि कोई ये मानता है कि ये गलती जानबूझकर करी गई है तो फिर तो थोड़ा सब्र कीजिए.. देखिए कि ये गड्ढा-खोद निर्णय किसके लिए नुकसानदेह या घातक सिद्ध होता है - और तब तक तो निराश होने की जरूरत नहीं..

इसलिए कुल मिलाकर मेरा निष्कर्ष यही है कि भाजपाई-कोंग्रेसी जितने उत्साहित दिख रहे हैं उतने उत्साहित हैं नहीं.. और 'आपियन्स' जितने निराश दिख रहे हैं उतना निराश होना बनता ही नहीं..

और भाजपाई-कॉंग्रेसी ज्यादा ही उत्साहित और 'आपियन्स' ज्यादा ही निराशा क्यों ??..
क्योंकि भाजपाइयों-कोंग्रेसियों में मक्कारी कूट-कूट कर भरी है - और आपियन्स में मक्कारी की नितांत कमी है और सच्चाई ज्यादा है - जिसके कारण वे जल्दी विचलित हो जाते हैं - छुईमुई हुए जाते हैं.. ..

पर मेरा दिल ये भी कहता है कि 'आपियन्स' जैसे हैं अच्छे हैं.. !! जय हिन्द !!

ब्रह्म प्रकाश दुआ
'मेरे दिमाग की बातें - दिल से':- https://www.facebook.com/bpdua2016/?ref=hl

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